बारिश बचपन की…कुछ ऐसी थी….

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बारिश बचपन की …

कुछ ऐसी थी
वो बारिश बचपन की
चीटियां अंडे ले जब चढती दिवार
चिरैया करती धूल में स्नान
देख यह समझ जाते हम
बारिश होगी झमाझम ।

पड़ती जब बूँदें तपती धरा में
माटी गीली होकर
उच्चछवासित हो उठती
उसकी सोंधी सोंधी खुशबू से
मतवाले हो जाते हम ।

मादर बजाते बादल
करमा पारी खेलती वर्षा बिजली
अंखरा (छानी)में
उनके सुर,ताल,लय भरे
गीत,नृत्य से मदहोश हो जाते हम

हो जाती कुछ संधि
खपरैलो के बीच में
जहाँ से गिरती पानी की बूँदें टप-टप
दौड़ दौड़ कर लगाते बर्तन
खटिया,बिस्तर बचाते कभी समान हटाते
यहाँ से वहां हम ।

हर घर के ओरिया से
झरते झरने झर-झर
नहा कर मिटाते बिमारियाॅ
और भगाते घुमौरियो की किचकिच भी
सामने घरों के नदियाँ सी बहती कल कल
जिसमें गिरते,फिसलते भीगते
छप-छप करते हम ।

बना कागज़ की नाव
भान ऐसा जैसे जहाज चला रहे हो
किसी की रूकती,अटकती
अपनी आगे निकल जाती तो
अकड़ बादशाहों वाली होती
ऊँची गर्दन कर ताली बजाते
उसके पीछे-पीछे भागते हम ।

एक ही छाते में तीन चार सहेलियां
सिमट कर समा जाते,
तू भींगना मत
जरा और इधर आजा
ऐसा कहते करते एक दूजे के साथ
पाठशाला को जाते हम ।

बारिश में खाने का कुछ और ही मजा था
खाते मुगौडी,भजिया और समोसे
अमचुर,टमाटर की चटनी के साथ
चूल्हे और अंगीठी में सिकते भुट्टे
लगा उसमें नमक,घी,नीबू
चटखारे ले लेकर खाते हम ।

धूल और धूप से बेहाल अनमने से पेड़ पौधे
छोटे छोटे से गमले
घर की कबेलू वाली छतें
बारिश के बाद जब पडती
धूप की किरणें उन पर
दिखाई देते ऐसे जैसे नहला धुलाकर
रगड़ कर पोंछ कर इन्हें मखमली बाना पहना दिया गया हो,साथ इनके प्रफुल्लित होते
तरोताजा महसूस करते हम ।

बारिश बचपन की...कुछ ऐसी थी....

लेखक =संध्या गुप्ता

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